टीवी में एंकरिंग करते हुए एक दशक होने को है।
एक दशक…
सुनने में बड़ा शानदार लगता है।
लेकिन इस एक दशक के बाद आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है, हिम्मत भी अब जवाब देने लगी है।
और ऐसे वक्त में बार-बार इंटर्नशिप के दिनों की वो आवाजें कानों में गूंजती हैं
“मीडिया में क्या रखा है?”
“लड़के हो… एंकरिंग कैसे करोगे?”
“अभी बच्चे हो, पढ़ने की उम्र है। किसी सरकारी नौकरी की तैयारी क्यों नहीं कर लेते?”
“जाओ, मुखर्जी नगर में कोचिंग ज्वाइन करो। वहीं कमरा लेकर रहो।”
उस वक्त लगता था, ये लोग मेरे सपनों के दुश्मन हैं।
आज लगता है…
शायद वो काफी हद तक सही कहते थे।
और कई बार तो ये भी लगता है कि गलत मैं भी नहीं था।
मैंने अपने मन की करी, क्योंकि सुनो सबकी, करो अपने मन की।
सुना था..हर काली रात के बाद सुनहरी सुबह जरूर होती है।
बस किसी ने ये नहीं बताया था कि कुछ रातें इतनी लंबी होती हैं कि सुबह आने का इंतजार ही जिंदगी बन जाता है।
टीवी न्यूज़रूम का सबसे बड़ा दुर्भाग्य, मेल एंकर होना…
टीवी स्क्रीन पर छाती फाड़-फाड़कर Gender Equality की बातें होती हैं।
महिलाओं के अधिकारों पर डिबेट होती है।
बराबरी के अधिकार पर प्राइम टाइम चलता है।
लेकिन कैमरे के पीछे न्यूज़रूम की दुनिया में तस्वीर कई बार कुछ और नजर आती है।
कई जगहों पर ऐसा लगता है कि मेल एंकर होना ही अपने आप में एक नुकसान है।
एक पुरुष एंकर के सामने शायद पहला सवाल यह नहीं होता कि
“तुम कितना अच्छा बोलते हो?”
“तुम्हारी राजनीतिक समझ कितनी है?”
“लाइव में कितनी पकड़ है?”
“डिबेट कैसा कर लेते हो”
बल्कि सवाल कहीं और से आता है
“मेल एंकर की जरूरत ही कितनी है?”
कई न्यूज़रूम में दस फीमेल एंकर्स के मुकाबले एक या मुश्किल से दो मेल एंकर्स दिखाई देते हैं।
और सवाल यह नहीं कि महिलाओं को मौका क्यों मिल रहा है।
सवाल यह है कि
पुरुषों को बराबरी का मौका क्यों नहीं मिल रहा?
महिला मित्रों से अब तक सुनता आया था
“औरत ही औरत की दुश्मन होती है।”
लेकिन टीवी न्यूज़रूम ने एक नई कहावत सिखा दी
“यहां आदमी ही आदमी का दुश्मन बना बैठा है।”
और विडंबना देखिए…
कई जगहों पर इस व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे लोग खुद पुरुष हैं।
यानी फैसला भी आदमी का…
कुर्सी भी आदमी की…
और नुकसान भी आदमी का।
वाह साहब! क्या शानदार व्यवस्था है।
1970 में आई फिल्म ‘ पहचान ‘ का एक गीत है।
मुकेश की आवाज.. बोल थे
“आदमी हूं, आदमी से प्यार करता हूं।”
गीत में इंसानियत थी। मोहब्बत थी। भाईचारा था।
लेकिन टीवी न्यूज़रूम की कहानी लिखने बैठूं तो लगता है, यहां तो मुखड़ा ही बदल गया है
“आदमी हूं… आदमी से नफ़रत करता हूं।”
और भाईसाहब, ये सिर्फ गाने की पैरोडी नहीं है।
कई न्यूज़रूम में ऐसा महसूस होता है कि मेल एंकर्स की जरूरत ही नहीं है।
नौकरी के लिए बात करो तो जवाब मिलता है
“ऊपर से मना है।”
अब ये ‘ऊपर वाला’ कौन है?
पता नहीं।
लेकिन बड़ा ताकतवर है।
इतना ताकतवर कि उसका नाम लेने की भी जरूरत नहीं पड़ती।
बस एक लाइन काफी है
“ऊपर से मना है, मेल एंकर नहीं रखना ”
और सामने खड़े दस साल के अनुभव वाले पत्रकार की पूरी उम्मीद वहीं बैठ जाती है।
और सबसे दिलचस्प बात?
एक मेल एंकर चैनल छोड़ता है…
उसकी जगह किसी मेल एंकर को रखने के बजाय फीमेल एंकर को रख लिया जाता है।
फिर सवाल उठता है..
क्या यह बराबरी है?
अगर है, तो पुरुषों के हिस्से की बराबरी कहां है?
मैं साफ कर दूं..
ये महिलाओं के खिलाफ लिखा गया लेख नहीं है।
बिल्कुल नहीं।
महिला एंकर्स खूब मेहनत करती हैं।
उन्हें मौके मिलने चाहिए।
उन्हें आगे बढ़ना चाहिए।
लेकिन बराबरी का मतलब किसी एक को ऊपर उठाने के लिए दूसरे को नीचे धकेलना नहीं हो सकता।
Gender Equality का मतलब अगर Equality है…
तो फिर Equality दोनों तरफ होनी चाहिए।
सबसे ज्यादा मुश्किल शायद उन मेल एंकर्स की है जिनके पास 8-10 साल का अनुभव है।
इतना अनुभव कि उन्होंने चुनाव देखे हैं।
ग्राउंड रिपोर्टिंग की है।
लाइव डिबेट की हैं।
रात-रात भर बुलेटिन किए हैं।
स्टूडियो की लाइट में अपनी जवानी छोड़ी है। न्यूज रूम के लिए अपना सबकुछ कुर्बान कर दिया है।
लेकिन जब नौकरी की बारी आती है तो पता चलता है..
“लॉबी बनाओ।”
किसी बड़े आदमी से फोन करवाओ।
किसी संपादक के किसी करीबी को जानो।
किसी बड़े नाम की सिफारिश लेकर जाओ।
तब शायद दरवाजा खुले।
यानी अनुभव आपकी जेब में हो सकता है…
लेकिन नौकरी की चाबी किसी और की जेब में है।
और अगर आपके पास वो चाबी नहीं है तो दस साल का अनुभव भी कई बार दरवाजे के बाहर खड़ा रहता है।
और सैलरी?
उस पर बात न ही करें तो अच्छा है।
इतना मिलता है कि आदमी महीने का महीना किसी तरह जीवित रह जाए।
बाकी जिंदगी?
भौतिक सुखों का त्याग कीजिए।
घर का सपना थोड़ा आगे रखिए।
बचत को भूलिए।
और खुद से कहिए..
“पहले नौकरी बचा लो, जिंदगी बाद में देखेंगे।”
क्योंकि न्यूज़रूम में कई बार पत्रकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं होती कि उसने कितना कमाया…
बल्कि यह होती है कि..
“भाई, अभी तक टिका हुआ हूं।”
मैं फिर कह रहा हूं..
ये लेख महिलाओं के खिलाफ नहीं है।
ये किसी महिला एंकर के खिलाफ नहीं है।
ये उस सोच के खिलाफ है जिसमें बराबरी का नारा तो दोनों के लिए लगाया जाता है, लेकिन अवसर का तराजू एक तरफ झुका हुआ महसूस होता है।
अगर महिला एंकर प्रतिभा के दम पर आगे बढ़ती है.. उसे बढ़ना चाहिए।
अगर पुरुष एंकर प्रतिभा के दम पर आगे बढ़ता है.. उसे भी बढ़ना चाहिए।
बस इतना सा सवाल है।
क्या हम सच में बराबरी चाहते हैं?
या फिर सिर्फ कैमरे के सामने बराबरी की बातें करना चाहते हैं?
क्योंकि कैमरा बंद होने के बाद असली चेहरा दिखाई देता है।
और न्यूज़रूम का यही चेहरा पिछले एक दशक से देख रहा हूं।
शायद इसीलिए आज मन में वही पुराना गीत घूम रहा है…
लेकिन शब्द बदल गए हैं।
आदमी हूं…
आदमी से नफ़रत करता हूं।
गुस्ताखी माफ।
Disclaimer: मीडिया4समाचार को भेजे गए पत्र पर आधारित ))




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