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सुप्रीम कोर्ट पहुंचे वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम,जानिए क्या हैं पूरा मामला

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नई दिल्ली विधायी विशेषाधिकारों (Legislative Privilege) की आड़ में अभिव्यक्ति की आजादी और प्रेस की स्वतंत्रता पर लग रहे अंकुशों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बहस तेज हो गई है। वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने सुप्रीम कोर्ट में जारी एक महत्वपूर्ण मामले में हस्तक्षेप की अनुमति मांगते हुए अर्जी दाखिल की है।

​यह पूरा मामला सात जजों की संविधान पीठ के समक्ष विचारधीन है। याचिका में मुख्य रूप से यह मुद्दा उठाया गया है कि क्या जनप्रतिनिधियों को मिले विशेष अधिकार नागरिकों और मीडिया के मौलिक अधिकारों से ऊपर हो सकते हैं।

​संवैधानिक मर्यादा और मौलिक अधिकारों का संतुलन

​अधिवक्ता-ऑन-रिकॉर्ड नेहा राठी के माध्यम से दाखिल की गई इस अर्जी में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 105 (संसद) और अनुच्छेद 194 (विधानसभा) के तहत दिए गए विशेषाधिकार विधायिका को अपने दायित्व बिना किसी बाहरी दबाव के निभाने के लिए हैं।

​इन अधिकारों को “असीमित या निरंकुश” शक्ति के रूप में व्याख्यायित नहीं किया जाना चाहिए। अर्जी में जोर दिया गया है कि विशेषाधिकारों की व्याख्या पूरे संविधान के दायरे में रहकर होनी चाहिए, ताकि यह अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिलने वाले प्रेस की स्वतंत्रता और आम नागरिकों के सूचना के अधिकार से न टकराएं।

​एम.एस.एम. शर्मा मामले के फैसले पर पुनर्विचार की मांग

​अजीत अंजुम ने अपनी अर्जी में ऐतिहासिक Pandit M.S.M. Sharma v. Sri Krishna Sinha मामले में दिए गए फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग की है।

​इसके साथ ही, शीर्ष अदालत से यह स्पष्ट मार्गदर्शन देने का अनुरोध किया गया है कि किसी सदन या विधायिका की कार्यवाही की आलोचना किस सीमा तक कानूनी मानी जाएगी और कब वह विशेषाधिकार के उल्लंघन के दायरे में आएगी। पत्रकारों के लिए यह स्पष्टता बेहद जरूरी है, ताकि सदन की कार्यवाही पर निष्पक्ष रिपोर्टिंग और उसकी स्वस्थ आलोचना बिना किसी कानूनी भय के की जा सके।

​कुणाल कामरा भी कर चुके हैं हस्तक्षेप की मांग

​उल्लेखनीय है कि अजीत अंजुम से पहले स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा भी इस मामले में हस्तक्षेप याचिका दायर कर चुके हैं। कामरा ने अपनी अर्जी में तर्क दिया था कि विशेषाधिकारों का इस्तेमाल नागरिकों के बोलने के अधिकार को दबाने के लिए एक हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता।

​6 अक्टूबर से होगी ऐतिहासिक सुनवाई

​यह मामला वर्ष 2003 का N. Ravi v. Speaker, Legislative Assembly Chennai (W.P. (Crl.) No. 206-210/2003) है, जिसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ 6 अक्टूबर 2026 से शुरू करने जा रही है।

​अदालत को यह तय करना है कि विशेषाधिकारों की संवैधानिक सीमा क्या है और नागरिकों की स्वतंत्रता, मीडिया के अधिकारों तथा विधायिका की गरिमा के बीच एक स्वस्थ संतुलन कैसे बनाया जाए।

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Author: media4samachar

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