बिना किसी पूर्व नोटिस या औपचारिक प्रक्रिया के सेवा समाप्ति की सूचना; प्रभावित पत्रकारों ने लगाया महीनों के बकाया भुगतान को अटकाने और जबरन रेवेन्यू थोपने का गंभीर आरोप
मुरादाबाद डिजिटल मीडिया संस्थानों में ग्राउंड रिपोर्टरों के अधिकारों और सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। जनपद मुरादाबाद में हाइपरलोकल डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म Public App से जुड़े दो पत्रकारों को बिना किसी पूर्व सूचना या औपचारिक प्रक्रिया के अचानक सेवा से मुक्त कर दिया गया। आरोप है कि प्रबंधन के प्रतिनिधियों ने सोमवार शाम फोन कॉल के जरिए दोनों संवाददाताओं को काम बंद करने का फरमान सुना दिया। इसके साथ ही दोनों पत्रकारों का वेतन भी रोक दिया गया है, जिसे लेकर स्थानीय मीडिया कर्मियों में भारी आक्रोश है।
फोन कॉल पर थमाया ‘मौखिक फरमान’, कोई नोटिस नहीं
प्रभावित रिपोर्टरों के अनुसार, संस्थान की ओर से नौकरी समाप्त करने को लेकर न तो कोई ईमेल भेजा गया और न ही कोई लिखित नोटिस या कारण बताओ पत्र जारी किया गया। सोमवार देर शाम अचानक एक कॉल आई, जिसमें सीधे तौर पर कहा गया कि अब उनकी सेवाएं समाप्त की जा रही हैं।
किसी भी संगठित या पेशेवर संस्थान में अपनाई जाने वाली न्यूनतम प्रक्रिया (Exit Policy) और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को दरकिनार करते हुए अचानक किए गए इस निष्कासन से पत्रकार सकते में हैं।
विज्ञापन का दबाव और विरोध की पृष्ठभूमि
पीड़ित रिपोर्टरों में शामिल विजेंद्र लंबे समय से मुरादाबाद क्षेत्र में पब्लिक ऐप के लिए ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे थे। सूत्रों और रिपोर्टर के अनुसार, पिछले कुछ समय से प्रबंधन द्वारा संपादकीय कार्य के साथ-साथ उन पर विज्ञापन (रेवेन्यू) जुटाने का लगातार अनुचित दबाव बनाया जा रहा था।
विजेंद्र इस व्यवस्था का विरोध करते रहे थे और उन्होंने प्रबंधन के सामने स्पष्ट किया था कि एक फील्ड रिपोर्टर का मुख्य दायित्व निष्पक्ष खबरें जुटाना है, न कि व्यावसायिक विज्ञापन लाना। माना जा रहा है कि विज्ञापन के इस अनैतिक दबाव को स्वीकार न करना और प्रबंधन के सामने अपनी बात रखना ही इस अचानक की गई कार्रवाई की मुख्य वजह बना।
वेतन रोकने से गहराया संकट, श्रम कानूनों के उल्लंघन का आरोप
नौकरी से हटाने के साथ-साथ दोनों पत्रकारों का अर्जित वेतन भी रोक लिया गया है। प्रभावित कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने पूरे महीने कड़ी मेहनत से फील्ड में खबरें कवर कीं, लेकिन बकाया भुगतान देने के बजाय उनका वेतन अटका दिया गया है।
श्रम कानूनों और ‘पेमेंट ऑफ वेजेस एक्ट’ के तहत किसी भी कर्मचारी का काम किया हुआ वेतन रोकना पूरी तरह गैर-कानूनी है। पत्रकारों का कहना है कि यदि संस्थान को सेवाएं समाप्त ही करनी थीं, तो नियमानुसार नोटिस पीरियड, उसका वेतन और फुल एंड फाइनल सेटलमेंट की पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी।
डिजिटल मीडिया में ग्राउंड रिपोर्टरों का शोषण?
यह मामला केवल दो पत्रकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल और हाइपरलोकल मीडिया ऐप्स के उस कथित ‘गिग वर्कर’ और ‘स्ट्रिंगर मॉडल’ की पोल खोलता है, जहां जिला और तहसील स्तर के पत्रकारों से काम तो नियमित कर्मचारियों जैसा लिया जाता है, लेकिन उन्हें नियुक्ति पत्र, सामाजिक सुरक्षा और कानूनी अधिकारों से वंचित रखा जाता है। फोन पर काम से हटाना और मेहनताना रोक लेना इसी मनमानी कार्यसंस्कृति का हिस्सा बन चुका है।
प्रबंधन का पक्ष प्रतीक्षित
इस पूरे मामले में Public App प्रबंधन का आधिकारिक पक्ष अभी सामने नहीं आया है। प्रबंधन की ओर से यदि सेवा समाप्ति, नोटिस अवधि, बकाया भुगतान या विज्ञापन से जुड़े आरोपों पर कोई स्पष्टीकरण या बयान जारी किया जाता है, तो उसे निष्पक्षता के साथ इस खबर में शामिल किया जाएगा।
बहरहाल, स्थानीय पत्रकार संगठनों ने मामले का संज्ञान लेते हुए इसे श्रम विभाग (लेबर कमिश्नर) के समक्ष ले जाने और पत्रकारों के हक की लड़ाई लड़ने की बात कही है।




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