भोपाल/जयपुर/रायपुर: मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सालों से NDTV के लिए जमीनी स्तर पर काम कर रहे स्ट्रिंगर्स (जिला संवाददाताओं) के सामने अचानक गहरा संकट खड़ा हो गया है। गांव-कस्बों, तहसील और जिला मुख्यालयों से दिन-रात एक कर खबरें कवर करने वाले कई वरिष्ठ पत्रकारों को संस्थान से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। करीब दो दशकों से NDTV का चेहरा रहे कई स्ट्रिंगर्स के लिए यह सिर्फ काम खत्म होने का झटका नहीं है, बल्कि सालों में बनाई गई उनकी पेशेवर पहचान और भरोसे पर भी करारा प्रहार है।
छंटनी का दायरा: दो दशकों के जुड़ाव पर एक झटके में फिरा पानी
मध्य प्रदेश के कई जिलों से सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, करीब 20 वर्षों से NDTV के लिए रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को भी अब संस्थान से अलग कर दिया गया है। यही स्थिति राजस्थान और छत्तीसगढ़ के भी कई हिस्सों में देखने को मिल रही है।

प्रभावित पत्रकारों का कहना है कि उन्होंने संस्थान के लिए उस दौर में काम किया जब संसाधन बेहद सीमित थे। धूप, बारिश, ठंड और सुरक्षा के जोखिमों के बीच उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए संस्थान को विश्वसनीयता दिलाई। अब अचानक बिना किसी स्पष्ट भविष्य नीति या संवाद के उन्हें हटाए जाने से रोजी-रोटी के साथ-साथ उनके भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं।
”बिल के बारे में मत पूछिए…” — बेहद कम भुगतान और आर्थिक शोषण का आरोप
स्ट्रिंगर्स की बर्खास्तगी के साथ-साथ उनके मानदेय और भुगतान में भारी कटौती का मुद्दा भी तेजी से गरमा रहा है। राजस्थान के एक जिला मुख्यालय से NDTV के लिए लंबे समय से कवरेज कर रहे एक सहयोगी ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि उन्हें मिलने वाला मौजूदा भुगतान अपमानजनक स्तर तक कम है।
”बिल के बारे में पूछने में भी शर्म आती है। महीने भर की भागदौड़ के बाद करीब 2,000 रुपये का बिल बना है।” — राजस्थान के एक प्रभावित स्ट्रिंगर
यह सवाल अब मीडिया जगत में जोर-शोर से उठ रहा है कि किसी जिला मुख्यालय पर लगातार खबरें कवर करने वाले रिपोर्टर के लिए बाइक का पेट्रोल, मोबाइल रीचार्ज, इंटरनेट डेटा और मौके पर आने-जाने का खर्च ही हजारों में बैठता है। ऐसे में मात्र ₹2,000 के भुगतान में निष्पक्ष और गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता करना कितना व्यावहारिक है?
टीकमगढ़ से उठा विरोध का स्वर: “तानाशाही के चलते अलविदा”
संस्थान के प्रति नाराजगी का एक बड़ा उदाहरण मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ से सामने आया। वहां से NDTV के लिए लंबे समय से रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकार सूर्यप्रकाश गोस्वामी ने आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप में अपना संदेश लिखकर ग्रुप छोड़ दिया।
अपने संदेश में गोस्वामी ने लिखा:
- अनिल कुमार की तानाशाही नीतियों के चलते वे NDTV को अलविदा कह रहे हैं।
- उन्होंने वर्षों तक साथ काम करने वाले फील्ड के साथियों के प्यार और डेस्क के सहयोगियों के आभार जताया।
सूर्यप्रकाश का यह संदेश केवल एक पत्रकार का व्यक्तिगत गुस्सा नहीं है, बल्कि यह उन तमाम स्ट्रिंगर्स की सामूहिक पीड़ा को दर्शाता है जो कॉर्पोरेट मीडिया की कार्यशैली से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
मीडिया उद्योग के सामने खड़े बड़े सवाल
NDTV में जारी इस उथल-पुथल ने भारतीय मीडिया के संगठनात्मक ढांचे और स्ट्रिंगर व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है:
- श्रम का कोई उचित मूल्यांकन नहीं: क्या जिला और ग्रामीण स्तर पर अपनी जान जोखिम में डालकर खबरें जुटाने वाले पत्रकारों के श्रम का सही मूल्यांकन हो रहा है?
- सुरक्षा और अधिकारों का अभाव: दो दशक तक काम करने के बाद भी यदि स्ट्रिंगर के पास न तो कोई सामाजिक सुरक्षा (PF/Insurance) है और न ही नौकरी की गारंटी, तो इस श्रम का जिम्मेदार कौन है?
- ग्राउंड जर्नलिज्म बनाम स्टूडियो डिबेट: क्या मुख्यधारा का मीडिया अब जमीन की खबरों और रीजनल नेटवर्क को समेटकर सिर्फ स्टूडियो डिबेट्स तक सीमित होना चाहता है?
भविष्य की राह: पहचान बचाने की जंग
सालों से नेटवर्क की रीढ़ रहे इन स्ट्रिंगर्स का बाहर होना इस बात का संकेत है कि अब रीजनल जर्नलिज्म को नए विकल्पों की तलाश करनी होगी। प्रभावित पत्रकारों का मानना है कि भले ही संस्थान ने उनसे मुंह मोड़ लिया हो, लेकिन जनता के बीच उन्होंने जो विश्वसनीयता कमाई है, वही उनकी असली ताकत है। अब कई पत्रकार अपने स्वतंत्र यूट्यूब चैनल, डिजिटल न्यूज पोर्टल और लोकल नेटवर्क के जरिए अपनी बात जनता तक पहुंचाने की तैयारी कर रहे हैं।




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