नई दिल्ली: भारतीय मीडिया और विज्ञापन (Advertising) जगत में इन दिनों टेलीविजन रेटिंग सिस्टम के भविष्य और उसकी विश्वसनीयता को लेकर एक गंभीर वैचारिक बहस छिड़ गई है। इंडस्ट्री का एक बड़ा और उभरता हुआ वर्ग अब यह मानने लगा है कि मौजूदा टीवी रेटिंग की चुनौतियों का समाधान पारंपरिक सैंपल साइज (पैनल का आकार) बढ़ाने में नहीं है। इसके बजाय, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से सीधे ‘फर्स्ट-पार्टी व्युअरशिप डेटा’ हासिल करना अधिक व्यावहारिक और सटीक समाधान हो सकता है।
हाल ही में इंडस्ट्री के भीतर चर्चा में आए एक नए प्रस्ताव में कहा गया है कि रेटिंग एजेंसियों को बड़े पैनल बनाने की भारी-भरकम कसरत करने के बजाय API (एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस) एक्सेस पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
क्या है नया प्रस्ताव और इसके फायदे?
इस प्रस्ताव के अनुसार, देश के सभी ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स, कनेक्टेड टीवी (CTV) सेवाओं और डिजिटल वीडियो डिस्ट्रीब्यूटर्स को एक मान्यता प्राप्त ऑडियंस मेजरमेंट एजेंसी को वास्तविक समय (रियल-टाइम) में ‘अनॉनिमाइज्ड’ (गुमनाम) व्युअरशिप डेटा तक API के जरिए पहुंच देनी चाहिए।
साथ ही, ब्रॉडकास्ट और स्ट्रीमिंग होने वाले हर कंटेंट पर एक समान वॉटरमार्क होना चाहिए, जिससे टेलीविजन, स्ट्रीमिंग और कनेक्टेड डिवाइसेज पर एक ही “Content Rating Point (CRP)” लागू किया जा सके। समर्थकों का मानना है कि इससे:
- सैंपल बायस (पक्षपात) पूरी तरह खत्म हो जाएगा।
- घरों में पीपल मीटर लगाने और ‘हाउसहोल्ड रिक्रूटमेंट’ की भारी लागत से मुक्ति मिलेगी।
- कुछ हजार घरों के पैनल की जगह करोड़ों दर्शकों के वास्तविक डेटा के आधार पर सटीक मेजरमेंट संभव होगा।
’Walled Gardens’ और व्यावहारिक चुनौतियाँ
भले ही यह प्रस्ताव तकनीकी रूप से आकर्षक लगता हो, लेकिन मीडिया एजेंसियों, विज्ञापनदाताओं और मेजरमेंट विशेषज्ञों ने इसमें कई बड़ी व्यावहारिक चुनौतियों की ओर इशारा किया है। उनके मुताबिक, इस राह में पांच मुख्य अड़चनें हैं:
- वैश्विक कंपनियों के व्यावसायिक हित: Google (YouTube), Amazon (Prime Video), Netflix और Meta जैसी खरबों डॉलर की वैश्विक टेक कंपनियां अपने-अपने स्वतंत्र इकोसिस्टम (Walled Gardens) के रूप में काम करती हैं। उनके पास अपना सबसे मूल्यवान ऑडियंस डेटा किसी स्वतंत्र थर्ड-पार्टी एजेंसी के साथ साझा करने का न तो कोई व्यावसायिक कारण है और न ही कोई कानूनी बाध्यता।
- भरोसे और ऑडिट का संकट: वर्तमान में BARC जैसी एजेंसियों के पैनलों का स्वतंत्र ऑडिट और जांच होती है। लेकिन अगर पूरा डेटा प्लेटफॉर्म्स के API से आएगा, तो पूरी इंडस्ट्री को खुद उन प्लेटफॉर्म्स द्वारा दिए गए आंकड़ों पर ही भरोसा करना पड़ेगा। इसके अलावा, टेक कंपनियां बिना किसी पूर्व सूचना के समय-समय पर अपनी API नीतियां बदलती रहती हैं।
- ‘डिवाइस’ बनाम ‘दर्शक’ का अंतर: डिजिटल सर्वर डेटा केवल यह बता सकता है कि किस स्क्रीन या डिवाइस पर कंटेंट चला। लेकिन भारत जैसे देश में, जहां पूरा परिवार एक साथ बैठकर टीवी देखता है, सर्वर डेटा यह नहीं बता सकता कि स्क्रीन के सामने असल में कौन बैठा था। विशेषज्ञों के अनुसार, “विज्ञापनदाता डिवाइस नहीं खरीदते, वे दर्शक खरीदते हैं।”
- नीतिगत सीमाएं: Television Rating Agencies Policy, 2026 जैसी सरकारी नीतियां तकनीक-न्यूट्रल फ्रेमवर्क की बात तो करती हैं और नए प्रयोगों को बढ़ावा देती हैं, लेकिन वे किसी निजी कंपनी को अपना डेटा सार्वजनिक करने के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं।
’हाइब्रिड मॉडल’ ही भविष्य की राह
यही कारण है कि अमेरिका जैसे विकसित बाजारों में भी वर्षों के निवेश के बावजूद अभी तक पूरी तरह से एकीकृत क्रॉस-प्लेटफॉर्म मेजरमेंट सिस्टम लागू नहीं हो पाया है। भारत में रेटिंग्स को लेकर चल रहे विवादों के बीच, विशेषज्ञ पैनल सिस्टम को पूरी तरह खत्म करने के पक्ष में नहीं हैं।
इंडस्ट्री के दिग्गजों का मानना है कि इसका सबसे व्यावहारिक समाधान हाइब्रिड मेजरमेंट मॉडल में है। इस मॉडल के तहत:
- जो प्लेटफॉर्म्स स्वेच्छा से डेटा साझा करना चाहते हैं, उनके करोड़ों डिजिटल सिग्नल्स (सेंसस डेटा) को लिया जाए।
- इसके बाद, दर्शकों की सटीक प्रोफाइल (उम्र, वर्ग, साथ बैठकर देखने की आदत) का अनुमान लगाने के लिए एक स्वतंत्र रूप से ऑडिट किए गए पारंपरिक पैनल को ‘कैलिब्रेशन लेयर’ के रूप में इस्तेमाल किया जाए।
निष्कर्ष:
“एक कार्यक्रम, एक आंकड़ा, हर स्क्रीन” का विचार आज भी विज्ञापनदाताओं के लिए सबसे बड़ा सपना है। लेकिन इस लक्ष्य तक पहुंचने की राह में चुनौती तकनीकी नहीं, बल्कि प्रशासनिक, गवर्नेंस और प्रतिस्पर्धी कंपनियों के व्यावसायिक हितों के टकराव को सुलझाने की है।





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