नई दिल्ली: चैनलों की फ्रेंचाइजी, मालिकाना हक और प्रसारण कारोबार में हिस्सेदारी दिलाने के नाम पर लोगों से कथित तौर पर मोटी रकम वसूलने के आरोपों ने साधना मीडिया समूह को विवादों के घेरे में ला खड़ा किया है। समूह के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर राकेश कुमार गुप्ता पर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने विभिन्न राज्यों के लोगों को मीडिया चैनल दिलाने और उसका पूर्ण नियंत्रण सौंपने का भरोसा देकर लाखों-करोड़ों रुपये जुटाए, लेकिन तय वादे पूरे नहीं किए।
कई राज्यों में फैला नेटवर्क, करोड़ों रुपये फंसे होने का दावा
सामने आ रहे इनपुट के अनुसार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों के कारोबारी व मीडियाकर्मी इस कथित लेनदेन का शिकार होने का दावा कर रहे हैं। पीड़ितों में से कुछ लोगों के ₹1.5 करोड़ से लेकर ₹3 करोड़ तक फंसे होने की बात कही जा रही है।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि रकम लेने के बाद उन्हें प्रसारण नियमों, सरकारी गाइडलाइंस और कागजी औपचारिकताओं का हवाला देकर लगातार टाला जाता रहा। लंबे समय तक केवल आश्वासनों के सहारे रखे जाने के बाद न तो उन्हें चैनल का मालिकाना हक मिला और न ही दी गई रकम वापस लौटाई गई। हालांकि, इन सभी दावों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित वित्तीय दस्तावेजों की औपचारिक जांच अभी बाकी है।
एक ही चैनल पर कई सौदों और रीब्रांडिंग के आरोप
उत्तर प्रदेश के एक ब्यूरो चीफ विशाल सिंह ने बातचीत में समूह की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, समूह के तहत करीब 22 चैनल संचालित होने का दावा किया जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन चैनलों के लाइसेंस रद्द होने या ब्लैकलिस्ट होने का खतरा पैदा होता है, उनके नाम और मूल कंपनियों में फेरबदल कर दिया जाता है।
इसके साथ ही यह गंभीर आरोप भी लगाया गया है कि एक ही चैनल के लिए अलग-अलग लोगों से संपर्क कर उन्हें मालिकाना हक देने का झांसा दिया गया और बदले में भारी रकम वसूली गई। बाद में अधिकार न मिलने पर लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि इन शिकायतों में सच्चाई पाई जाती है, तो यह सामान्य कारोबारी विवाद न रहकर धोखाधड़ी और वित्तीय अनियमितता की आपराधिक जांच का विषय बनेगा।
रसूख दिखाने के दावे और कानूनी पहलू
सूत्रों के हवाले से यह दावा भी सामने आया है कि सीएमडी राकेश कुमार गुप्ता अपने व्हाट्सएप डिस्प्ले पिक्चर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ अपनी तस्वीर लगाते हैं। शिकायतकर्ताओं के बीच इस बात की चर्चा है कि इस तरह के रसूख का इस्तेमाल प्रभाव जमाने के लिए किया जाता रहा।
हालांकि, कानूनी दृष्टि से किसी केंद्रीय मंत्री या वरिष्ठ नेता के साथ तस्वीर होना किसी तरह के कारोबारी संबंध, राजनीतिक संरक्षण या सरकारी प्रभाव का प्रमाण नहीं माना जा सकता। जब तक इस बात के ठोस साक्ष्य सामने नहीं आते कि इस कथित नजदीकी का इस्तेमाल पीड़ितों पर दबाव बनाने या उन्हें गुमराह करने के लिए किया गया, तब तक इसे केवल एक दावे के रूप में ही देखा जाएगा।
सरकारी विज्ञापनों की पात्रता पर भी उठे सवाल
विवादों के बीच साधना मीडिया समूह के चैनलों को मिलने वाले सरकारी विज्ञापनों पर भी उंगलियां उठने लगी हैं। जहां कुछ इनपुट में समूह के पास 16 चैनल होने की बात कही गई है, वहीं मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ संपादक ने यह संख्या 22 बताई है।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि समूह के कई चैनल केंद्र व राज्य सरकारों की विज्ञापन पात्रता संबंधी शर्तों और अनिवार्य गाइडलाइंस को पूरा नहीं करते, इसके बावजूद उन्हें सरकारी विज्ञापन जारी किए जा रहे हैं। जानकारों का कहना है कि इस मामले में किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले विज्ञापन आवंटन के आधिकारिक रिकॉर्ड, संबंधित चैनलों की पात्रता और विज्ञापन जारी करने वाले विभागों के नियमों की गहन पड़ताल जरूरी होगी।



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