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IBC24 न्यूज चैनल में स्ट्रिंगर्स पर गाज: कैजुअल एप्रोच का आरोप या इवेंट के नाम पर लाखों की वसूली का दबाव ?

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भोपाल मध्य प्रदेश के प्रमुख समाचार चैनल IBC24 के आंतरिक स्ट्रिंगर नेटवर्क में उस समय हड़कंप मच गया, जब चैनल के MP Stringers आधिकारिक ग्रुप में प्रोग्रामिंग से जुड़े वरिष्ठ पदस्थ प्रवीण दुबे के नाम से एक कड़ा संदेश जारी किया गया। इस संदेश के जरिए मंदसौर, नीमच, देवास और सीहोर के स्ट्रिंगर्स को तत्काल प्रभाव से चैनल से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। संदेश में स्ट्रिंगर्स को हटाने की वजह काम को लेकर लगातार कैजुअल एप्रोच बताई गई। इसके साथ ही ग्रुप में मौजूद बाकी जिलों के संवाददाताओं को भी खुली चेतावनी दे दी गई कि जिसे चैनल का काम सेकेंडरी लगता है, वह संभल जाए।

​इस एकतरफा फरमान के बाद न केवल संबंधित पत्रकारों को व्हाट्सएप ग्रुप से रिमूव कर दिया गया, बल्कि चैनल के पूरे नेटवर्क में यह संदेश आग की तरह फैल गया। हालांकि, जब इस पूरे मामले की पड़ताल की गई, तो पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही बयां कर रही है। जमीनी संवाददाताओं का आरोप है कि उन्हें काम की वजह से नहीं, बल्कि नेताओं और विधायकों से इवेंट के नाम पर लाखों रुपये की वसूली न कर पाने के चलते बलि का बकरा बनाया गया है।

​₹200 की खबर बनाम लाखों का रेवेन्यू टारगेट

​मीडिया जगत में स्ट्रिंगर्स की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। चैनल के लिए धूप, बारिश और जोखिम भरे माहौल में ग्राउंड रिपोर्टिंग करने वाले स्ट्रिंगर को प्रति खबर महज ₹200 के आसपास का भुगतान मिलता है। इतने मामूली मानदेय पर काम करने वाले स्थानीय पत्रकारों से फुल-टाइम जवाबदेही की उम्मीद की जाती है।

​हैरानी की बात यह है कि लाखों रुपये का पैकेज लेने वाले अधिकारी एसी कमरों में बैठकर यह तय करते हैं कि ग्राउंड पर काम करने वाले पत्रकार का काम कैजुअल है या गंभीर। सवाल उठता है कि क्या इन चारों जिलों के संवाददाताओं की खबरों की संख्या, गुणवत्ता और ग्राउंड कवरेज का कोई आधिकारिक डेटाबेस खंगाला गया था? क्या उन्हें हटाने से पहले कोई कारण बताओ नोटिस या सुधार का समय दिया गया? ग्रुप में सरेआम बेइज्जत कर निकाल देना किसी भी पेशेवर संस्थान की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाता है।

​पीड़ित स्ट्रिंगर्स ने खोला मोर्चा, लगाए गंभीर आरोप

​इस पूरे घटनाक्रम पर जब सीहोर के स्थानीय स्ट्रिंगर कवि छोकर से बात की गई, तो उन्होंने चैनल के इस कदम पर तीखा आक्रोश जताया। कवि छोकर ने बताया कि वह पिछले 10 वर्षों से पूरी निष्ठा के साथ संस्थान से जुड़े हुए थे। उन्होंने खुलासा किया कि असली विवाद काम का नहीं बल्कि इवेंट के नाम पर पैसों का है। प्रबंधन की तरफ से स्थानीय विधायकों से 4 से 5 लाख रुपये जुटाकर इवेंट कराने का भारी दबाव बनाया जा रहा था। हर साल इतना बड़ा फंड जुटाना किसी भी पत्रकार के लिए मुमकिन नहीं है। इसी टारगेट को पूरा न करने के कारण उन्हें और करीब सात अन्य लोगों को बाहर कर दिया गया।

​वहीं, देवास के स्ट्रिंगर मोहनिश वर्मा ने चैनल की अंदरूनी कार्यप्रणाली की पोल खोलते हुए बताया कि वह पिछले 8 वर्षों से चैनल के लिए काम कर रहे थे। उन्होंने सीधा आरोप लगाया कि जब से प्रवीण दुबे संस्थान में आए हैं, तब से ग्राउंड रिपोर्टर्स का उत्पीड़न बढ़ गया है। ऐसा लगता है मानो वे प्रबंधन से भारी राजस्व वसूलने का वादा करके आए हों। पत्रकारों से खबरों के बजाय नेताओं और जनप्रतिनिधियों से इवेंट स्पॉन्सरशिप के नाम पर लाखों रुपये लाने को कहा जा रहा था। आज के दौर में न्यूज चैनलों की साख वैसे ही दांव पर है, ऐसे में पत्रकारों पर वसूली का दबाव डालना अनैतिक है। मोहनिश ने बताया कि इसी अड़ियल रवैये और दबाव के चलते उन्होंने एक महीने पहले ही अपना इस्तीफा भेज दिया था।

​पारदर्शिता और साख पर उठे सवाल

​IBC24 जैसे स्थापित चैनल की रीढ़ स्टूडियो में बैठने वाले चेहरे नहीं, बल्कि दूर-दराज के कस्बों और तहसीलों में दौड़ने वाले यही स्ट्रिंगर होते हैं। एक झटके में चार जिलों के संवाददाताओं को सार्वजनिक रूप से हटाना और बाकी को धमकाना संस्थान की छवि को गहरा धक्का पहुंचाता है।

​अब गेंद प्रवीण दुबे और IBC24 प्रबंधन के पाले में है। प्रबंधन को यह साफ करना होगा कि वर्षों से निष्ठापूर्वक काम कर रहे पत्रकारों को किस आधार पर बाहर किया गया और क्या स्ट्रिंगर्स द्वारा लगाए जा रहे इवेंट वसूली के आरोप सही हैं? फरमान जारी कर देना बेहद आसान है, लेकिन जमीनी पत्रकारों के स्वाभिमान और मेहनत को कुचलना किसी भी मीडिया संस्थान के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।

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Author: media4samachar

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