नई दिल्ली: भारतीय टीवी पत्रकारिता में निष्पक्षता और साख का संकट लगातार गहराता जा रहा है। हाल ही में एबीपी न्यूज चैनल की एंकर चित्रा त्रिपाठी द्वारा कांग्रेस प्रवक्ता रागिनी नायक को सोशल मीडिया पर ब्लॉक करने और उसके बाद उपजे विवाद ने एक नया मोड़ ले लिया है। इस घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया पर चित्रा त्रिपाठी की पत्रकारिता के तौर-तरीकों, सत्ता के प्रति उनके कथित झुकाव और आलोचनाओं से भागने की प्रवृत्ति को लेकर तीखी निंदा हो रही है। आलोचक इसे भारतीय पत्रकारिता के गिरते स्तर का एक जीवंत उदाहरण मान रहे हैं।

सवाल पूछने वाले को ‘ब्लॉक’ करना: असहमति से डर या आत्ममुग्धता?
विवाद की शुरुआत तब हुई जब चित्रा त्रिपाठी ने गर्व से यह जाहिर किया कि उन्होंने एक विपक्षी पार्टी की महिला प्रवक्ता को ट्विटर पर ब्लॉक कर रखा है। डिजिटल युग में जब पत्रकारों से उम्मीद की जाती है कि वे हर पक्ष की बात सुनेंगे, तब एक वरिष्ठ एंकर द्वारा असहमति की आवाज को ‘ब्लॉक’ कर देना उनके लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल खड़े करता है।
आलोचकों का कहना है कि जब कोई पत्रकार जनता या विपक्ष के तीखे सवालों का सामना नहीं कर पाता, तो वह ‘ब्लॉक बटन’ का सहारा लेकर अपनी एक काल्पनिक और सुरक्षित दुनिया बना लेता है। इसे पत्रकारिता का साहस नहीं, बल्कि वैचारिक कायरता और आत्ममुग्धता माना जा रहा है।
पत्रकारिता के भेष में ‘चीयरलीडिंग’: कमेंट्री बॉक्स से सत्ता के लिए बैटिंग
इस पूरे मामले में चित्रा त्रिपाठी पर सबसे गंभीर आरोप यह लगा है कि वे पत्रकारिता के सिद्धांतों को ताक पर रखकर एक खास राजनीतिक दल (भाजपा) के एजेंडे को आगे बढ़ा रही हैं।
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- घोषित राजनीति बनाम अघोषित एजेंडा: राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं का काम अपनी पार्टी का पक्ष रखना होता है, जो कि पूरी तरह घोषित है। लेकिन जब एक बड़ी एंकर ‘निष्पक्ष पत्रकार’ का चोला ओढ़कर सत्ता पक्ष के प्रवक्ताओं की भाषा बोलने लगे, तो दर्शक ठगा हुआ महसूस करते हैं।
- सवालों को ब्लॉक करने की कला: पत्रकार का मूल धर्म सत्ता से जवाबदेही तय करना है। लेकिन आज की टीवी पत्रकारिता में चित्रा त्रिपाठी जैसे चेहरों पर आरोप है कि वे सत्ता से सवाल पूछने के बजाय, सत्ता की तरफ से आने वाले हर संकट और सवाल को ‘ब्लॉक’ करने के लिए ढाल बन जाते हैं।
“कांग्रेस प्रवक्ता रागिनी नायक अगर अपनी पार्टी के लिए मैदान में खेल रही हैं तो वह समझ आता है, लेकिन चित्रा त्रिपाठी जब पत्रकारिता के कमेंट्री बॉक्स में बैठकर सत्ताधारी दल के लिए ‘चीयरलीडर’ की भूमिका निभाने लगती हैं, तो दर्शकों का भरोसा टूट जाता है।”
स्क्रीनशॉट का डर: एक्सपोज होने की खीझ?
चित्रा त्रिपाठी की इस बात के लिए भी आलोचना हो रही है कि वे अपने पुराने वीडियो और बयानों के स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर आने से असहज हो जाती हैं। डिजिटल दौर में स्क्रीनशॉट जनता का वह हथियार हैं जो पत्रकारों के दोहरे मापदंडों (Double Standards) को बेनकाब करते हैं।
विपक्ष के नेताओं द्वारा जब उनके शो के स्क्रीनशॉट लेकर उनके पक्षपात को उजागर किया गया, तो चित्रा त्रिपाठी ने इसे आलोचना के रूप में स्वीकार करने के बजाय इसे सामने वाले का “ऑब्सेशन” (सनक) करार दे दिया। यह रवैया दिखाता है कि मुख्यधारा के एंकर अब आत्म-निरीक्षण करने की क्षमता पूरी तरह खो चुके हैं।
प्रेस कार्ड की आड़ में सत्ता का राग
जनता के बीच अब यह धारणा मजबूत हो चुकी है कि आज की मुख्यधारा की टीवी पत्रकारिता और राजनीतिक प्रवक्ताओं में कोई अंतर नहीं रह गया है। सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं कि राजनेताओं के गले में तो उनकी पार्टी का पट्टा साफ दिखाई देता है, लेकिन खतरनाक वे पत्रकार हैं जो गले में ‘प्रेस कार्ड’ टांगकर अंदर से सत्ता का झांझ बजा रहे हैं।
निष्कर्ष:
चित्रा त्रिपाठी पर केंद्रित यह विवाद केवल एक एंकर का व्यक्तिगत मामला नहीं है, बल्कि यह उस चाटुकारिता वाली पत्रकारिता (Sycophancy) का प्रतीक है जिसने भारत में मीडिया को लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ से गिराकर ‘सत्ता का भोंपू’ बना दिया है। जनता अब यह साफ देख रही है कि धुन एक ही है, बस नेता और पत्रकार के वाद्य यंत्र अलग-अलग हैं।



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